क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

Bhagavad Gita 13.15

Chapter 13 · The Field & Its Knower

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् | असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च

Shining by the functions of all the senses, yet without the senses; unattached, yet supporting all; devoid of qualities, yet their experiencer.

वह समस्त इन्द्रियों के गुणो (कार्यों) के द्वारा प्रकाशित होने वाला, परन्तु (वस्तुत:) समस्त इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति रहित तथा गुण रहित होते हुए भी सबको धारणपोषण करने वाला और गुणों का भोक्ता है

त्यो सम्पूर्ण इन्द्रियका वृत्तिहरूद्वारा प्रकाशित हुन्छ, तर वास्तवमा सबै इन्द्रियरहित छ; आसक्तिरहित भएर पनि सबैलाई धारण–पोषण गर्ने र निर्गुण भएर पनि गुणहरूको भोक्ता छ

Context

That reality illuminates all senses yet has no senses itself; it supports everything yet clings to nothing; it's beyond qualities yet experiences all qualities. These paradoxes point to something that logic alone cannot capture.

संदर्भ

वह सत्य सभी इंद्रियों को प्रकाशित करता है फिर भी स्वयं इंद्रियहीन है; सबको धारण करता है फिर भी किसी से चिपकता नहीं; गुणों से परे है फिर भी सभी गुणों का अनुभव करता है। ये विरोधाभास उस ओर इशारा करते हैं जिसे केवल तर्क नहीं पकड़ सकता

सन्दर्भ

त्यो सत्यले सबै इन्द्रियलाई प्रकाशित गर्छ तर आफू स्वयं इन्द्रियरहित छ; सबैलाई धारण गर्छ तर कुनैसँग पनि टाँसिँदैन; गुणहरूभन्दा पर छ तापनि सबै गुणको अनुभव गर्छ। यी विरोधाभासहरूले तर्कले मात्र समेट्न नसक्ने कुरातिर संकेत गर्छन्

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