मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः
Fix thy mind on Me; by devoted to Me; sacrifice unto Me; bow down to Me; having thus united thy whole self to Me, taking Me as the supreme goal, thou shalt come unto Me.
(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे
मन ममा स्थिर गर, मेरो भक्त बन, मेरै पूजन गर र मलाई नमस्कार गर। यसरी मलाई परम आश्रय मानी आफूलाई ममा जोडेपछि तिमी मलाई नै प्राप्त गर्नेछौ
Fix your mind on Krishna, be His devotee, worship Him, bow to Him—uniting your whole self with Him as the supreme goal, you'll reach Him. This chapter's concluding instruction summarizes everything: total orientation toward the Divine in thought, feeling, and action leads home.
मन कृष्ण में लगाओ, उनके भक्त बनो, उनकी पूजा करो, उन्हें प्रणाम करो—अपने संपूर्ण अस्तित्व को परम लक्ष्य के रूप में उनसे जोड़कर, उन्हें प्राप्त होगे। इस अध्याय का समापन निर्देश सब कुछ सारांशित करता है: विचार, भाव और कर्म में परमात्मा की ओर पूर्ण अभिमुखता घर पहुंचाती है
मन कृष्णमा स्थिर गर्ने, उहाँको भक्त बन्ने, उहाँको पूजा गर्ने, उहाँलाई नमस्कार गर्ने—आफ्नो सम्पूर्ण अस्तित्व उहाँसँग परम लक्ष्यका रूपमा जोड्दा उहाँलाई प्राप्त गरिन्छ। यस अध्यायको समापन निर्देशले सबै कुरा सारांशित गर्छ: विचार, भाव र कर्म—सबैमा परमात्मा प्रति पूर्ण अभिमुखताले नै घर पुर्याउँछ
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