ध्यानयोग

Bhagavad Gita 6.45

Chapter 6 · The Yoga of Meditation

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः | अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्

But the Yogi who strives with assiduity, purified of sins and perfected gradually through many births, reaches the highest goal.

परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी सम्पूर्ण पापों से शुद्ध होकर अनेक जन्मों से (शनै: शनै:) सिद्ध होता हुआ, तब परम गति को प्राप्त होता है

तर प्रयत्नपूर्वक अभ्यासमा लागिरहने योगी सम्पूर्ण पापबाट शुद्ध भई अनेक जन्महरूमा क्रमशः सिद्ध हुँदै जान्छ र अन्ततः परम गति प्राप्त गर्छ

Context

The yogi who strives diligently, purified of sins, perfected over many births, finally reaches the highest goal. This long view is reassuring: perfection isn't demanded immediately. Gradual, patient progress across lifetimes eventually completes the journey.

संदर्भ

परिश्रम से प्रयत्न करने वाला योगी, पापों से शुद्ध, अनेक जन्मों में धीरे-धीरे सिद्ध होकर, अंततः परम गति को प्राप्त होता है। यह दीर्घकालिक दृष्टि आश्वस्त करने वाली है: तुरंत पूर्णता की मांग नहीं है। जन्मों में क्रमिक, धैर्यपूर्ण प्रगति अंततः यात्रा पूरी करती है

सन्दर्भ

निरन्तर परिश्रमपूर्वक प्रयास गर्ने योगी, पापहरूबाट शुद्ध भई, धेरै जन्महरूमा क्रमशः सिद्ध हुँदै अन्ततः परम गतिलाई प्राप्त गर्छ। यो दीर्घकालीन दृष्टिकोणले आश्वस्त पार्छ—पूर्णता तुरुन्तै अपेक्षित छैन। जन्म-जन्ममा क्रमिक, धैर्यपूर्ण प्रगतिले अन्ततः यात्रा पूरा गर्छ

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